Asoka information in Hindi (सम्राट अशोक के बारे में व्यापक जानकारी) –


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Asoka information in Hindi

Asoka information in Hindi / सम्राट अशोक के विषय में व्यापक जानकारी, कलिंग आक्रमण और शिलालेख

सम्राट अशोक मौर्य (Asoka information in Hindi) वंश का तीसरा सम्राट था. इसका शासनकाल लगभग 273-232 ई.पू. था. मौर्य वंश के संस्थापक उसके पितामह चन्द्र गुप्त मौर्य (लगभग 322-298 ई.पू.) थे. चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद उसका पिता बिन्दुसार (लगभग 298 ई.पू.-273 ई.पू.) गद्दी पर बैठा था. सिंहली इतिहास में सुरक्षित जनश्रुतियों के अनुसार अशोक अपने पिता बिन्दुसार के अनेक पुत्रों में से एक था और जिस समय बिन्दुसार की मृत्यु हुई उस समय अशोक मालवा में उज्जैन में राजप्रतिनिधि था. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि राजपद के उत्तराधिकार के लिए भयंकर भ्रातृयुद्ध हुआ जिसमें उसके 99 भाई मारे गए और अशोक गद्दी पर बैठा. वैसे अशोक के शिलालेखों में इस भ्रातृयुद्ध का कोई संकेत नहीं मिलता है. इसके विपरीत शिलालेख संख्या 5 से प्रकट होता है कि अशोक अपने भाई-बहनों, परिवार के प्रति शुभचिंतक था. गद्दी पर बैठने के चार वर्ष बाद तक उसका राज्यभिषेक नहीं हुआ. इसे इस बात का प्रमाण माना जाता है कि उसको राजा बनाने के प्रश्न पर कुछ विरोध हुआ होगा.

अशोक और उसके समकालीन राजा

अशोक सीरिया के राजा Antiochus II (261-246 ई.पू.) और कुछ अन्य यवन (यूनानी) राजाओं का समसामयिक था जिनका उल्लेख शिलालेख संख्या 8 में है. इससे पता चलता है कि अशोक ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में राज किया किन्तु उसके राज्याभिषेक की सही समय का पता नहीं चलता है. उसने लगभग 40 वर्ष राज्य किया. इसलिए शायद राज्याभिषेक के समय वह युवक ही रहा होगा.

अशोक का पूरा नाम अशोकवर्धन था. उसके लेखों में उसे सदैव “देवानामपिय” (देवताओं का प्रिय) और “पियदर्शिन्” (प्रियदर्शी) संबोधित किया गया है. केवल यास्की के लघु शिलालेख में उसको “देवानाम्-पिय अशोक” लिखा गया है.

कलिंग पर आक्रमण

अशोक (Asoka information in Hindi) के राज्यकाल के प्रारंभिक 12 वर्षों का कोई सुनिश्चित विवरण उपलब्ध नहीं है. इस काल में अपने पूर्ववर्ती राजाओं की तरह वह भी सामाजिक कार्यक्रमों, शिकार, मांस भोजन और यात्राओं में प्रवृत्त रहता था. किन्तु उसके राज्यकाल के 13वें वर्ष में उसके जीवन में एक बड़ा बदलाव आ गया. इस वर्ष राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद, उसने बंगाल की खाड़ी के तटवर्ती राज्य कलिंग पर आक्रमण किया. कलिंग राज्य उस समय महानदी और गोदावरी के बीच क्षेत्र में विस्तृत था. इस युद्ध के कारण का पता नहीं चलता है, लेकिन उसने कलिंग को विजय करके उसे अपने राज्य में मिला लिया. इस युद्ध में भयंकर रक्तपात हुआ. एक लाख व्यक्ति मारे गए और डेढ़ लाख बंदी बना लिए गए तथा कई लाख व्यक्ति युद्ध के आनेवाली अकाल, महामारी आदि विभीषिकाओं से नष्ट हो गए. अशोक को लाखों मनुष्यों के इस विनाश और उत्पीड़न से बहुत पश्चाताप हुआ और वह युद्ध से घृणा करने लगा.

इसके  बाद ही अशोक अपने शिलालेखों के अनुसार “धम्म” (धर्म) में प्रवृत्त हुआ. यहाँ धम्म का आशय बौद्ध धर्म लिया जाता है और वह शीघ्र ही बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया. बौद्ध मतावलंबी होने के बाद अशोक का व्यक्तित्व एक दम बदल गया.

आठवें शिलालेख में जो संभवतः कलिंग विजय के चार वर्ष बाद तैयार किया गया था, अशोक ने घोषणा की: कलिंग देश में जितने आदमी मारे गए, मरे या कैद हुए उसके सौवें या हजारवें हिस्से का नाश भी अब देवताओं के प्रिय को बड़े दुःख का, कारण होगा”. उसने यह भी घोषणा की कि “(आप) विश्वास रखें कि जहाँ तक क्षमा का व्यवहार हो सकता हैं, वहां तक राजा हम लोगों के साथ क्षमा का बर्ताव करेगा.”

बौद्ध धर्म का रुख

कलिंग-विजय के बाद अशोक (Asoka information in Hindi) व्यक्तिगत रूप से बौद्ध मतावलंबी हो गया था. यह बात इससे सिद्ध होती है कि उसने अपने को यास्की के लघु शिलालेख संख्या 1 में बौद्ध-शाक्य बतलाया है और भाब्रू के शिलालेख में तीन रत्नों (बुद्ध, धर्म और संघ) में अपनी आस्था व्यक्त  की है. सारनाथ के शिलालेख से स्पष्ट है कि उसने केवल बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्राएँ कीं और बौद्ध भिक्षु संघ की एकता बनाए रखने का प्रयत्न किया. इससे भी यही प्रकट होता है कि वह बौद्ध मतावलंबी था.




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